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मोबाइल की चमक में खो गई कॉमिक्स और उपन्यासों की दुनिया

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किताबों के ज्ञान पर भारी पड़ रहा मोबाइल, शॉर्ट वीडियो की बढ़ती लत से बच्चों की आदतों और संस्कारों पर असर

हेमन्त कुमार श्रीवास्तव/ ओम मिश्रा

श्रावस्ती। कभी बच्चों के हाथों में कॉमिक्स, बाल पत्रिकाएं और उपन्यास दिखाई देते थे। गर्मियों की छुट्टियों में कहानी की किताबें पढ़ना, पंचतंत्र की कथाओं से सीख लेना और चाचा चौधरी, नंदन, चंपक जैसी बाल पत्रिकाओं के किरदारों के साथ कल्पना की दुनिया में खो जाना बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था। लेकिन डिजिटल दौर में तस्वीर बदल गई है। अब किताबों की जगह स्मार्टफोन ने ले ली है और पढ़ने की आदत पर शॉर्ट वीडियो का आकर्षण भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।मोबाइल और इंटरनेट ने जहां ज्ञान की दुनिया को बच्चों की उंगलियों तक पहुंचा दिया है, वहीं बिना निगरानी के अत्यधिक स्क्रीन समय और लगातार शॉर्ट वीडियो देखने की आदत अभिभावकों और शिक्षकों के लिए चिंता का विषय बन रही है। कुछ ही सेकंड में बदलते वीडियो बच्चों का ध्यान तेजी से आकर्षित करते हैं। इसके कारण लंबे समय तक किताब पढ़ने, किसी विषय पर एकाग्र होकर सोचने और धैर्यपूर्वक सीखने की आदत प्रभावित हो सकती है।

किताबों से मिलता है गहराई वाला ज्ञान

बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि बच्चों में भाषा, कल्पना, तर्क, संवेदनशीलता और सामाजिक मूल्यों को विकसित करने का माध्यम भी रहा है। कहानी और उपन्यास पढ़ते समय बच्चा पात्रों के व्यवहार, परिस्थितियों और उनके निर्णयों को समझता है। इससे उसकी कल्पनाशक्ति विकसित होती है और वह किसी विषय को विस्तार से समझने का प्रयास करता है।इसके विपरीत लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत में सामग्री तेजी से बदलती रहती है।

शॉर्ट वीडियो में हर सामग्री बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हर सामग्री बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होती। मनोरंजन के नाम पर ऐसे वीडियो भी सामने आ सकते हैं जिनमें अभद्र भाषा, अनुचित व्यवहार, हिंसक दृश्य या दिखावे को बढ़ावा देने वाली सामग्री हो। कम उम्र के बच्चे कई बार सही और गलत सामग्री के बीच अंतर नहीं कर पाते।ऐसे में अभिभावकों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों को पूरी तरह मोबाइल से दूर करने के बजाय उनके स्क्रीन समय, देखी जाने वाली सामग्री और ऑनलाइन गतिविधियों पर उम्र के अनुसार निगरानी रखना जरूरी है।

'मोबाइल नहीं, पढ़ने की आदत बने पहचान'

शिक्षकों और अभिभावकों का मानना है कि बच्चों के दैनिक जीवन में किताबों के लिए निश्चित समय होना चाहिए। घर में माता-पिता स्वयं किताब पढ़ेंगे तो बच्चों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। स्कूलों में बाल पुस्तकालय, कहानी पाठ, पुस्तक चर्चा और रचनात्मक लेखन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देकर बच्चों को फिर से किताबों से जोड़ा जा सकता है।बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह काटना आज के डिजिटल युग में व्यावहारिक समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि मोबाइल ज्ञान का साधन बने, आदत का मालिक नहीं। डिजिटल शिक्षा के साथ पुस्तकों का संतुलन बनाकर ही बच्चों के ज्ञान, व्यवहार और व्यक्तित्व का बेहतर विकास किया जा सकता है।

विशेषज्ञों की सलाह—'डिजिटल अनुशासन जरूरी'

बाल मनोविज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों की उम्र और जरूरत के अनुसार स्क्रीन टाइम निर्धारित करना, सोने से पहले मोबाइल से दूरी रखना, भोजन के समय फोन न देना तथा प्रतिदिन पढ़ने और खेलकूद के लिए समय तय करना उपयोगी कदम हो सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बच्चों को केवल 'मोबाइल मत चलाओ' कहने के बजाय उन्हें पढ़ने, खेलने, बातचीत करने और रचनात्मक गतिविधियों के बेहतर विकल्प दिए जाएं।आज जरूरत मोबाइल छीनने की नहीं, बल्कि बच्चों को मोबाइल और किताब के बीच सही संतुलन सिखाने की है। किताबें उनके भीतर सोच पैदा करती हैं और सही डिजिटल मार्गदर्शन उन्हें आधुनिक दुनिया के लिए तैयार करता है।

 

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